शनिवार, 7 मई 2016

नाभि चिकित्सा

                             नाभि रहस्य
नाभि के केन्द्र से हट जाने के कारण कई प्रकार की बिमारीया होती है ,असहजतामानसिक समस्याएंबुरे स्वप्नएवं मूत्राशय संबंधी समस्याएं भी उत्पन्न हो सकती हैं। महिलाओ की नाभि पुरुषो की अपेझा अधिक टलती है इसीलिये नाभी से सम्बधि रोग महिलाओ को पुरुषो अपेझा अधिक  होते है
   नाभि के बिना मनुष्य की कल्पना तक नहीं की जा सकती। उदर (पेट) पर स्थित नाभि बहुत ही रहस्यमयी है। माता के गर्भ में नवजात बालक का सबसे पहले नाभि केन्द्र ही विकसित होता है। गर्भ के बाहर आते ही सर्वप्रथम माता के शरीर से शिशु को जोडने वाली उस नली का सम्बन्ध विच्छेद करना होता है जो शिशु की नाभि से जुडी होती है। अगर किसी कारणवश जन्म लेते ही नाभि को माता से जोडने वाली नली को शीघ्र ही न काटा जाए तो बालक विकलांग भी हो सकता है।
नाभि का अपने स्थान पर रहना स्वस्थ्य का प्रतीक होता है किन्तु आजकल की जीवन पद्घति के कारण अधिकांश व्यक्तियों का नाभिकेन्द्र अपने स्थान पर प्राय: नहीं होता। लम्बे समय तक ऐसी स्थिति रहने पर जी मिचलाने लगता है, भोजन से अरूचि हो जाती है, पेट में मरोड तथा वायु की शिकायत हो जाती है। कई बार कब्ज एवं दस्त की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती हैं।
नाभि के अपने केन्द्र से हट जाने पर हृदय में जलन, खांसी, अनिद्रा, तनाव, महिलाओं में मासिक असंतुलन, शरीर के निचले भाग में पीडा, आंतों की समस्या के साथ ही लिवर, पित्ताशय तथा दाहिनी किडनी भी प्रभावित होती है। इससे शरीर के ऊपरी बायें भाग पर दर्द एवं तनाव की अनुभूति भी हो सकती है। इसके कारण पैन्क्रियाज, जठर, प्लीहा, तक रोगग्रस्त हो सकते हैं।
लम्बर क्षेत्र के विकेन्द्रीकरण के कारण दाहिने पैर में दर्द हो सकता है। शरीर का दाहिना भाग प्रभावित होता है तथा किडनी तथा आंतों में खिंचाव, कडापन तथा दर्द की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है।

स्वस्थ नाभि का आकार गोलाकार, मांसपेशियां सुडौल तथा केन्द्र में स्पन्दन करने वाला होता है किन्तु नाभि अगर केन्द्र में स्थित न हो, त्वचा में लचीलेपन की बजाय कठोरता हो, नाभि सक्रिय एवं सजग न हो, नाभि एक तरफ खिंची हुई, उभरी हुई अथवा दबी हुई हो या उसका आकार स्थायी रूप से बदल गया हो तो यह उस व्यक्ति में लंबे समय से किसी न किसी रोग की तरफ इंगित करता है किन्तु जब परिस्थितियां अनियंत्रित हो जाती हैं, तब रोग के लक्षण बाहर दिखायी देने लगते हैं।
नाभि को प्राण ऊर्जा का केन्द्र बिन्दु माना जाता है क्योंकि यहीं से प्राण ऊर्जा का वितरण, नियंत्रण एवं संतुलन होता है। इसी कारण जब नाभि अपने स्थान से खिसक जाती है, तो सभी अंगों को मिलने वाली प्राण ऊर्जा का संतुलन बिगडने लगता है। किसी को आवश्यकता से अधिक तो किसी को आवश्यकता से बहुत कम ऊर्जा मिलने लगती है। फलस्वरूप उन अंगों की कार्यप्रणाली असंतुलित हो जाती है और अलग अलग लक्षण प्रकट होकर रोग के नामों से पुकारा जाने लगता है। इस असंतुलन को ठीक करते ही रोग नष्ट हो जाते हैं।
नाभि का खिंचाव अनेक प्रकार से हो सकता है। नाभि बांयी तरफ खिंचकर जा सकती है। इसी प्रकार नाभि का खिंचाव दाहिनी ओर, ऊपर की ओर, नीचे की ओर, बांए पुठ्ठे की तरफ, दाहिने पुठ्ठे की तरफ, ऑवरीज की तरफ, लिवर की तरफ तथा पैन्क्रियाज या तिल्ली की तरफ हो जाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार कैंसर , मधुमेह, अस्थमा या हृदयाघात, गुर्दे का रोग ,  अचेतन की अवस्था, सभी में नाभि के केन्द्र को परखने के बाद ही उपचार करना चाहिए। नाभि के केन्द्र में स्थिर न रहने के कारण ही ये असाध्य रोग भी पनपते हैं।
नाभि को केन्द्र में लाने की अनेक विधियां अपने देश में प्रचलित हैं। वे सभी विधियां इतनी सरल हैं कि इसे अपने घर पर ही किया जा सकता है। नाभि का अपने केन्द्र में स्पन्दन करना स्वस्थ नाभि का प्रतीक है। अगर केन्द्र का स्पन्दन नाभि स्थल पर न हो, ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं हो तो इसे नाभि का खिसकना या पेचुटि कहा जाता है।
नाभि को केन्द्र में लाने की विधि किसी अच्छे जानकार से सीख लेना हितकारी रहता है।

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